कमजोर इंसान

दे दी आंखे उस खुदा ने,माने न इंसान !
अंधे हे पर आँख के,पूछे न इंसान…….!!

आँख हे पर दिखे न कोई,जाने सब इंसान !
निर्लज होकर यंही खड़ा हे,माने न इंसान..!!अकलमंद अब मुर्ख के,पीछे होगा क्या अंजाम !
नंगे हे यंहा और आँख हे नंगी जाने न इंसान….!!

आँख तो हे पर दीखता,नहीं हे माने न इंसान……!
आँख के आगे हेवान बने,सब माने न इंसान…..!!

सब समझे इंसान यंहा पर,अँधा हे इंसान……….!
कुदरत ने बनाया अच्छा हे पर,गन्दा हे इंसान..!!

गर स्वार्थ हे तब दीखता हे सब,पर माने न इंसान !
नहीं मन्न हे एक काम का,शो-२ करे इंसान………!!

इनकी बला से देश भी लुटे,चाहे हिन्दुस्तान…………..!
धरती माँ का चीर-हरण करे,कोई चुप क्यों हे इंसान !!

लगता हे हम सुखी जो होते,आँख से सारे अंधे होते… ……………….!
न देख पाता बुरा इंसान,लुटी पूरी इंसानियत सारी न माने इंसान.!!

” जय समाज ”

लेखक: रामप्रसाद रैकवार

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