Hindi Poems Archive

R.I.P SHASHI KAPOOR

Posted December 5, 2017 By admin

सच ही कहा है पंछी इनको,

रात को ठहरें तो उड़ जाएं,

दिन को आज यहाँ कल वहाँ है ठिकाना |

बागों में जब-जब फूल खिलेंगे,

तब-तब ये हरजाई मिलेंगे,

गुज़रेगा कैसे पतझड़ का ज़माना|

परदेसियों से ना अँखियाँ मिलाना,

परदेसियों को है इक दिन जाना |

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पहले इश्क़ को आग होने दीजिए,
फिर दिल को राख होने दीजिए…!

तब जाकर पकेगी बेपनाह मोहब्बत,
जो भी हो रहा बेहिसाब होने दीजिए…!

सजाएं मुकर्रर करना इत्मिनान से,
मगर पहले कोई गुनाह होने दीजिए…!

मैं भूला नहीं बस थोड़ा थक गया था,
लौट आऊंगा घर शाम होने दीजिए…!

चाँद के दीदार की चाहत दिन में जगी है,
आयेगा नज़र वो, रात होने दीजिए….!

नासमझ, पागल, आवारा, लापरवाह हैं जो,
संभल जाएंगे वो भी एहसास होने दीजिए…!!

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छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था
एक नाई, एक मोची, एक काला लुहार था

छोटे छोटे घर थे, हर आदमी बङा दिलदार था
कही भी रोटी खा लेते, हर घर मे भोजऩ तैयार था

बाड़ी की सब्जी मजे से खाते थे जिसके आगे शाही पनीर बेकार था
दो मिऩट की मैगी ना, झटपट दलिया तैयार था

नीम की निम्बोली और शहतुत सदाबहार था
छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था

अपना घड़ा कस के बजा लेते
समारू पूरा संगीतकार था

मुल्तानी माटी से तालाब में नहा लेते, साबुन और स्विमिंग पूल बेकार था
और फिर कबड्डी खेल लेते, हमे कहाँ क्रिकेट का खुमार था

दादी की कहानी सुन लेते,कहाँ टेलीविज़न और अखबार था
भाई -भाई को देख के खुश था, सभी लोगों मे बहुत प्यार था

छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था

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उलझनों और कश्मकश

Posted January 17, 2015 By admin

उलझनों और कश्मकश में उम्मीद की ढाल लिए
बैठा हूँ,
ए जिंदगी, तेरी हर चाल के लिए मैं दो चाल
लिए बैठा हूँ !!
लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख-मिचोली का,
मिलेगी कामयाबी, हौसला कमाल का लिए बैठा हूँ !!
चल मान लिया दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक,
गिरेबान में अपने ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ !!
ये गहराइयां, ये लहरें, ये तूफां, तुम्हे मुबारक,
मुझे क्या फ़िक्र,
मैं कश्तीया और दोस्त बेमिसाल लिए बैठा हूँ !!

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कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं
मोहब्बतों के भी मौसम अजीब होते हैं.

ज़िहानतों को कहाँ वक़्त ख़ूँ बहाने का
हमारे शहर में किरदार क़त्ल होते हैं.

फ़ज़ा में हम ही बनाते हैं आग के मंज़र
समंदरों में हमीं कश्तियाँ डुबोते हैं.

पलट चलें के ग़लत आ गए हमीं शायद
रईस लोगों से मिलने के वक़्त होते हैं.

मैं उस दियार में हूँ बे-सुकून बरसों से
जहाँ सुकून से अजदाद मेरे सोते हैं.

गुज़ार देते हैं उम्रें ख़ुलूस की ख़ातिर
पुराने लोग भी अजीब होते हैं……

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रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

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Khwabo Se Darti Hun

Posted February 20, 2013 By admin

Mein rone se darti hun juda hone se darti hun,

Meri ankhein bataati hain k mein sone se darti hun,

Meri ungli pakar lena mujhe tanha nahi karna,

Ye dunya ek mela hai tumhein khone se darti hun,

Jab hansti hun to kiun palkon k goshe bheeg jate hein,

Tumhein maloom hai mein is tarha rone se darti hun,

Jab se khwab dekha tha mujhe tum chor jaaoge,

Mein ab khwabon se darti hun mein ab sone se darti hun…!525073_406201796140963_1786073290_n

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Kayi din sey yun hi udaas hun..

Posted January 14, 2013 By admin

Yeh meri kitab e hayat hey,sad girl by poem world
Isey dil ki ankh sey parh zra….

Main warq warq terey samney,
Terey rubaru, terey pas hun..

Yeh teri umeed ko kia hua,
Kabhi tu ney ghor nhi kia…

Kisi shaam tu ney kaha to tha,
Teri saans hun, teri aas hun…

Yeh teri judayi ka gham nhi,
Yeh silsiley to hain roz k ….

Teri zaat is ka sabab nhi,
Kayi din sey yun hi udaas hun..

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jate howe khud ko tere pas bhool jaon

Posted January 13, 2013 By admin

kabhi lafaz bhol jaon kabhi bat bhol jaonforget me not by poem world
tujhy is qadar chahon k apni zaat bhol jaon

uth k tere pas se jo main chal dn__♥♥
jate howe khud ko tere pas bhool jaon

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Kisi Apne Ko Khona Wo Kya Jane

Posted January 13, 2013 By admin

Kisi Apne Ko KhonaWo Kya Jany,
Bina Neend K Sona
Wo Kya Jany,
Us Shaks Ne To
Mujh Ko Mehfilon
Mein Muskratay
Dekha Hai,
Meri Tanhai Ka
Rona Wo Kya Jany

never_let_me_go_by_poem-world

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