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यादों की फरमाइश भी कमाल की होती है…
सजदा वही होता है जहाँ दिल हार जाता हैं

पसीने की स्हायी से लिखे पन्ने कभी कोरे नहीं होते
जो करते है मेहनत दर मेहनत उनके सपने कभी अधूरे नहीं होते..

कभी रज़ामंदी तो कभी बग़ावत है इश्क
प्रेम राधा का, तो मीरा की भक्ति है इश्क

हर त्यौहार कुछ न कुछ बेचते नजर आते हैं……

कुछ बच्चों के “बड़े दिन” सिग्नल पे गुजर जाते हैं

अपने लबों से भी तो कभी आज़ाद कर ख्वाहिशें अपनी.
जरा मुझे भी तो मालूम हो मेरी तलब तुझे किस हद तक है

दोनों ने ही छोड़ दी फ़िक्र,
उसने मेरी, मैनें ख़ुद की…!

कुछ आता है खुद चलकर, कुछ तक चल जाना होता है
मिलता वही है जो लिखा है, बाक़ी सब बहाना होता है


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